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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मैं सफ़र में हूँ ...


हाँ मैं सफ़र में हूँ 
भावों के विचारों के 
ख्बावों के भंवर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
सोचा जो हुआ नहीं 
देखा जो मिला नहीं
दिया जो दिया नहीं  
पाया जो गिला नहीं 
प्यास के द्वार पर 
सागर के ज्वर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
आलिंगित हूँ शून्य के 
आगोश में अदृश्य के 
चुम्बित प्रतिचुम्बित सर्वदा 
खला के अधर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
धूप से लेकर छाँव तक 
सर से लेकर पाँव तक 
तन की हर ठाँव तक 
मैं तेरी नज़र में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
बाहों में तू है प्यार है 
रूह का तू सिंगार है 
मौन नत उन्मत्त सा
तू ही तो परमात्म द्वार है 
तुझ से दूर पास ही 
दर्द के दहर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...! -प्रिया  

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

वो मेरा चाँद...

उसके अंदाज़ का क्या कहना 
किरणें लुटा कर जो
रौशनी मांगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
मेरी आगोश में सिमट कर 
मेरी बाहों में लिपट कर 
अमी का सागर स्वयं 
अधरों की प्याली माँगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
बिछौने पर बिछे हुए 
लिहाफ सब लिए हुए 
वसन पट खोल सब 
परस की सुराही मांगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
बाहें फैला बुलाऊँ तो 
तन कण मन दिखाऊँ तो 
तड़प तरस खुद में 
सिमट सा जाता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है !