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गुरुवार, 26 जून 2014

दुर्लभ क्षण


मुझे लौट जाना है 
कुछ हरफ़ लुटा कर
शब्दों के अंतरीप बना कर
मुझे लौट जाना है 
चाँद अनमना सा 
बुलाता है 
बादलों के संदेश 
भिजवाता है 
बूंदों की रागिनी 
सुनाता है 
सच्चे झूठे सपने 
दिखाता है 
मुझे सपनों में घर
बनाना है 
मुझे लौट जाना है 
खड़ी कब से धरती 
के छोर पर
ध्रुवों की सर्द हवाओं 
के शोर पर
बर्फ की सफेद गली 
के मोड़ पर
मुझे आकाश की बाहों में 
समाना है
मुझे लौट जाना है। 

-- डॉ प्रिया सूफ़ी