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बुधवार, 11 अगस्त 2010

बतलाए कभी....



रुलाये कभी
बहलाये कभी
अधरों से तडप कर 
लगाये कभी...
तोडे कभी बेदर्दी सा....
अपने ही हाथों 
बनाये कभी....
उलझा दे मुझे यूं
धागों सा...
रेशम की तऱ्ह 
सुलझाये कभी...
मिटा दे मुझे बस 
शब्दों सा...
शमा की तऱ्ह 
जलाये कभी...
मिले तो लिपटाये 
बेलि सा...
जाये तो पलट न
आये कभी...
बरसे तो बरस जाये
बादल सा....
धरती की तऱ्ह 
सुखाये कभी...
बहाये मुझे यूं 
धारा सी....
सागर की तऱ्ह 
तरसाये कभी....
खुद को उस में 
भूल चुकी हूं....
कौन हूं मैं...
बतलाए कभी....!!!

मासूम कसक....



मिट्टी को क्या 
सराहते हो..?
बुत को खुदा बताते हो...
रंग के रंग में 
रंगने की 
उत्कट चाह दिखाते हो...
तू है तू बस
तू ही तू 
जीवन मरण की 
कसम उठते हो....
देखो फिर से पलट मुझे  
ढली हुई सी बर्फ हूं मैं 
धधकते सर्द 
ज्वालमुख की   
अंगार उगलती तडप 
हूं मैं....!
कटार सी उतरे 
सीने में जो...
सर्प की जहरीली 
पलट  हूं मैं....!
आंखो से जो न 
सम्भले कभी...
आंसूओं में भीगी 
पलक हूं मैं...!
मेरे उस महामानव के 
दिल की मासूम कसक हूं मैं....!!!