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गुरुवार, 26 जून 2014

दुर्लभ क्षण


मुझे लौट जाना है 
कुछ हरफ़ लुटा कर
शब्दों के अंतरीप बना कर
मुझे लौट जाना है 
चाँद अनमना सा 
बुलाता है 
बादलों के संदेश 
भिजवाता है 
बूंदों की रागिनी 
सुनाता है 
सच्चे झूठे सपने 
दिखाता है 
मुझे सपनों में घर
बनाना है 
मुझे लौट जाना है 
खड़ी कब से धरती 
के छोर पर
ध्रुवों की सर्द हवाओं 
के शोर पर
बर्फ की सफेद गली 
के मोड़ पर
मुझे आकाश की बाहों में 
समाना है
मुझे लौट जाना है। 

-- डॉ प्रिया सूफ़ी 

शुक्रवार, 17 मई 2013

वो राज़ ....



ज़िन्दगी के दर्द को कुछ इस तरह छिपाया जाये 
आँखें हों नम फिर भी मुस्कुराया जाये ...!
वो कहते हैं वो आयें गे घर मेरे 
चाँद तारों से चलो घर को सजाया ..जाये ...!
कुछ कहना था तुम से वो बात ...वो राज़ ...
चलो रात भर चाँद से बतियाया जाये ...!
हटो जाओ ...चलो अब सोने भी दो ...
नींद सा नशा कुछ आँखों से पिलाया जाये। 

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मैं सफ़र में हूँ ...


हाँ मैं सफ़र में हूँ 
भावों के विचारों के 
ख्बावों के भंवर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
सोचा जो हुआ नहीं 
देखा जो मिला नहीं
दिया जो दिया नहीं  
पाया जो गिला नहीं 
प्यास के द्वार पर 
सागर के ज्वर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
आलिंगित हूँ शून्य के 
आगोश में अदृश्य के 
चुम्बित प्रतिचुम्बित सर्वदा 
खला के अधर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
धूप से लेकर छाँव तक 
सर से लेकर पाँव तक 
तन की हर ठाँव तक 
मैं तेरी नज़र में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...!
बाहों में तू है प्यार है 
रूह का तू सिंगार है 
मौन नत उन्मत्त सा
तू ही तो परमात्म द्वार है 
तुझ से दूर पास ही 
दर्द के दहर में हूँ 
हाँ मैं सफ़र में हूँ ...! -प्रिया  

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

वो मेरा चाँद...

उसके अंदाज़ का क्या कहना 
किरणें लुटा कर जो
रौशनी मांगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
मेरी आगोश में सिमट कर 
मेरी बाहों में लिपट कर 
अमी का सागर स्वयं 
अधरों की प्याली माँगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
बिछौने पर बिछे हुए 
लिहाफ सब लिए हुए 
वसन पट खोल सब 
परस की सुराही मांगता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है ...!
बाहें फैला बुलाऊँ तो 
तन कण मन दिखाऊँ तो 
तड़प तरस खुद में 
सिमट सा जाता है 
वो मेरा चाँद रात भर 
चांदनी मांगता है !

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

तरस गई तरस गई...


 
 
द्वार द्वार भटक ई 
तेरी एक झलक को 
तरस  तरस ई 
 
खाली जाम पिए हुए 
तेरा नाम लिए हुए
कहे बिना बहक ई 
सुने बिना लहक ई 
चाँद आया बेवजह 
तन मन सजाया बेवजह 
बाहों में बिखर ई 
अधरों से लिपट ई 
कतरा कतरा टूटी थी
बूंदों में सिमट ई 
तूने देखा कुछ इस तरह
तेरी हो निपट ...!  
 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

नदी अभी जागी है



सुनो नदी अभी जागी है 
अभी तो सिराये हैं मैंने 
कुछ पूजा के फूल और
कुछ यादें पिछली रातों की
कुछ कलियाँ अपनी बातों सी
कोई कश्ती पिछली बरसातों की

सच! नदी अभी जागी है...! 
अभी तो बिखराए हैं मैंने
कुछ अहसास तूफानी लहरों से
कुछ मौन तुम्हारी बातों के...
कुछ पीले पन्ने ख्वाहिशों के 
कुछ सूखे फूल किताबों से...

हाँ ! नदी अभी जागी है
अभी तो सुनायी है मैंने 
कुछ बातें बीती रातों की 
कुछ दौड़ भाग भी दिन भर की
कुछ इठलाती खिलती ढलती सी
इक वेणी मेरे बालों की...

देखो! नदी अभी जागी है
अभी तो जगाई है मैंने 
इक आस तेरे आवन की...
कुछ टपकती गिरती बूँदें भी
वो पहले अपने सावन की...
निसिगंधा के फूलों की
कुछ महक वही मनभावन सी...
अब मान भी लो...जान भी लो 
नदी अभी जागी है...! 

सोमवार, 30 जनवरी 2012

ओ मेरी कलम





कलम ओ कलम 
अब तो कुछ बोल 
बहुत उदास है मन 
कोई खिड़की तो खोल...
बहुत साधारण है 
मेरी सोच की दुनिया 
छोटी बहुत है
मेरे शब्दों की दुनिया
तू ही अब कुछ नया बोल...!
मेरे कहे वो सुनता कहाँ है...?
सौ बार पुकारूं बोला कहाँ है...???
धरती का मालिक वो 
अम्बर का स्वामी
तू ही बता उसे 
मेरी बेकली की कहानी...!
हाँ प्रतीक्षा है मात्र प्रतीक्षा 
देर तक दूर तक 
सिर्फ प्रतीक्षा 
एक दिन तो तडपे गी 
उसकी मोहब्बत 
मेरे विश्वास की देख 
नादानी...!