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बुधवार, 11 अगस्त 2010

मासूम कसक....



मिट्टी को क्या 
सराहते हो..?
बुत को खुदा बताते हो...
रंग के रंग में 
रंगने की 
उत्कट चाह दिखाते हो...
तू है तू बस
तू ही तू 
जीवन मरण की 
कसम उठते हो....
देखो फिर से पलट मुझे  
ढली हुई सी बर्फ हूं मैं 
धधकते सर्द 
ज्वालमुख की   
अंगार उगलती तडप 
हूं मैं....!
कटार सी उतरे 
सीने में जो...
सर्प की जहरीली 
पलट  हूं मैं....!
आंखो से जो न 
सम्भले कभी...
आंसूओं में भीगी 
पलक हूं मैं...!
मेरे उस महामानव के 
दिल की मासूम कसक हूं मैं....!!!

2 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

again a very deep composition, you're a master!

Dr.Priya ने कहा…

Nahi surender ji...abhi kahan...abhi bahut raasta baaki hai...