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बुधवार, 11 अगस्त 2010

बतलाए कभी....



रुलाये कभी
बहलाये कभी
अधरों से तडप कर 
लगाये कभी...
तोडे कभी बेदर्दी सा....
अपने ही हाथों 
बनाये कभी....
उलझा दे मुझे यूं
धागों सा...
रेशम की तऱ्ह 
सुलझाये कभी...
मिटा दे मुझे बस 
शब्दों सा...
शमा की तऱ्ह 
जलाये कभी...
मिले तो लिपटाये 
बेलि सा...
जाये तो पलट न
आये कभी...
बरसे तो बरस जाये
बादल सा....
धरती की तऱ्ह 
सुखाये कभी...
बहाये मुझे यूं 
धारा सी....
सागर की तऱ्ह 
तरसाये कभी....
खुद को उस में 
भूल चुकी हूं....
कौन हूं मैं...
बतलाए कभी....!!!

4 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

kya baat hai priya ji....

kaun hoon main....

kaatil composition!

namita ने कहा…

khud ko usme dubo diya...........bas intha ho gayi fir apni talash ki to vajah hi nahi rahi.

bahut khoob.

Dr.Priya ने कहा…

Thanks Surender ji...

Dr.Priya ने कहा…

Namita di,
Khud ko kho kar hi usko paya jata hai...Hai na..???